दिव्य अभिव्यक्तियां: देश के जननायकों की दृष्टि में पतंजलि के  संन्यास दीक्षा महोत्सव का महत्व  

प.पू. स्वामी अवधेशानंद जी महाराज जूना पीठाधीश्वर, आचार्य महामण्डलेश्वर -
पतंजलि योगपीठ की यह ज्ञानधर्म धरा, ऋषिग्राम के इस सारस्वत परिसर में जहाँ वेद भगवान प्रतिष्ठित, जाग्रत, जीवंत, प्रखर, मुखर और सर्वत्र आह्लद के रूप में अनुभव किए जा सकते हैं ऐसे इस दिव्य, अनुपम, उद्दात भगवदीय परिवेश में जागृत पुरुष, जागरण के देवता के रूप में योगऋषि स्वामी रामदेव जी महाराज तथा अलौकिक, अनुपम, अद्भुत, उद्दात विभूति, चरक, सुश्रुत, पाणिणि और पतंजलि जिनमें नित्य चैतन्य हैं ऐसे इस विश्व के अत्यंत अलौकिक महापुरुष पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज की प्रेरणा से पतंजलि में दिव्य कार्य हो रहा है। वैदिक काल को अब हम साकार होते देख रहे हैं। यह हमारी भारत की पूर्व की अपूर्वता यहाँ चैतन्य है। सम्यक कामनाओं का न्यास ही संन्यास है। यद्यपि परमात्मा सर्वत्र सभी में हैं तथापि भगवान् की रचना में मनुष्य की कोटि उत्तम है। एक ही रूप सभी मनुष्यों में समान रूप से मनुष्यों के समूह में भी ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ स्थान व उनसे भी महनीय वानप्रस्थ को लेकिन अत्यंत आदरणीय, सदैव वंदनीय, उत्तम कोटि यदि है तो वह संन्यास है। उन्होंने भावी संन्यासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि अब आपकी परमहंस दीक्षा होनी है जिसमें आपको अपनी सभी एषेणाओं से मुक्त होना है।
प.पू. स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज कोषाध्यक्ष- श्री राम मंदिर न्यास
वैदिक परम्परा में सर्वोच्चतम पुष्प संन्यास है। संन्यास अपने भीतर से खिलना चाहिए और संन्यासी को ऐसा अनुभव करना चाहिए कि मैं भगवत स्वरूप सृष्टि की सेवा के लिए समर्पित हो रहा हूँ। साधु निर्भार, निद्र्वन्द्व रहकर श्रीमद्भगवद्गीता के दैवीय सम्पद को अपने आचरण में जीते हैं। ऐसा ही श्रेष्ठ जीवन पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज का है। उनकी संन्यास परम्परा में सैकड़ों दिव्य संन्यासी भाई व साध्वी बहनें राष्ट्र को समर्पित हो रहे हैं। पतंजलि योगपीठ से शताधिक विद्वान व विदुषियाँ संन्यास की दीक्षा लेंगे तथा 15000 से ज्यादा युवाओं ने संन्यासी होने की रुचि दिखाई जिनमें 500 प्रबुद्ध भाई-बहन आचार्य जी से ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेंगे, यह रोमांचित करने वाला स्वर्णक्षण है। ये चमत्कार तो पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ही कर सकते हैं। जल्द ही आप अपनी आँखों के सामने राम मंदिर का सपना पूरा होते देखेंगे। लगता है रामराज की स्वर्णिम शुरूआत हो चुकी है।
प.पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज संस्थापका अध्यक्ष- पतंजलि योगपीठ
ऋषि-ऋषिकाओं का वंश बढ़ाने के लिए, अपने ऋषियों के उत्तराधिकारी, प्रतिनिधि बनने के लिए, योगधर्म, वेद धर्म, सनातन धर्म, संन्यास धर्म को राष्ट्रधर्म, युगधर्म और विश्वधर्म के रूप में प्रतिष्ठापित करने के लिए लोग स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। स्वामी जी ने कहा कि पूरे विश्व में चारों ओर फैले ईष्या, द्वेष, भय, आतंकवाद, घृणा, धार्मिक उन्माद, रोगों के घात-प्रत्याघातों से बचने के लिए जब कोई मार्ग शेष नहीं बचेगा तो अंततः योग, आयुर्वेद, अध्यात्म व पतंजलि की शरण में आना ही होगा।
संन्यास मर्यादा, वेद, गुरु व शास्त्र की मर्यादा में रहते हुए शताधिक नवसंन्यासी एक बहुत बड़े संकल्प के लिए प्रतिबद्ध हो रहे हैं। ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास में प्रवेश करना सबसे बड़ा वीरता का कार्य है। इन संन्यासियों के रूप में हम अपने ऋषियों के उत्तराधिकारियों को भारतीय संस्कृति तथा परम्परा के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित कर रहे हैं। संन्यासी होना जीवन का सबसे बड़ा गौरव है। अब ये युवा संन्यासी ऋषि परम्परा का निर्वहन करते हुए मातृभूमि, ईश्वरीय सत्ता, ऋषिसत्ता तथा अध्यात्मसत्ता में जीवन व्यतीत करेंगे। पतंजलि योगपीठ के संन्यासी पूरे विश्व में संन्यास धर्म, सनातन धर्म व युगधर्म की ध्वजवाहक होंगे।
प.पूज्या साध्वी ऋतंभरा जी संस्थापिका- वात्सल्य ग्राम
पतंजलि के द्वारा पूरे विश्व में सनातन की प्रतिष्ठा के लिए बड़ा कार्य हो रहा है। पूज्य स्वामी जी के नेतृत्व में संन्यासियों की जो शृंखला तैयार की जा रही है, यह पूरे विश्व में सनातन धर्म व भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार करेंगे। संन्यासी होने का अर्थ पूर्ण विवेकी तथा पूर्ण श्रद्धा से आप्लावित होना है। श्रद्धा की, भक्ति की, समर्पण की, कृतज्ञता की, दिव्यता की पराकाष्ठा ही संन्यास है। यहाँ 1०० से अधिक विद्वान भाई व विदूषी बहनें अपना सर्वस्व राष्ट्रसेवा में समर्पित कर संन्यास मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हैं। यहाँ इतनी कम उम्र में संन्यासी बनने की प्रबल इच्छा के साथ संकल्पित युवाओं को देखकर मन प्रसन्न है। लगता है कि सनातन के ध्वजवाहक सनातन धर्म की प्रतिष्ठा के लिए पूरे विश्व में निकल चुके हैं। जल्द ही भारतीय परम्परा, सनातन व संन्यास परम्परा का गौरव पुनः पूरे विश्व में प्रतिष्ठित होगा।
प. श्रद्धेय आचार्य बालड्डष्ण जी महाराज  महामंत्री- पतंजलि योगपीठ
हमारा संन्यास या संस्कृति पलायनवादी नहीं है। संन्यासी अध्यात्म से जुड़कर ध्यान में आप्लावित हो शून्य जैसी चैतन्यपूर्ण स्थिति में प्रवेश पाते हैं, शून्य में उतरकर ही सृजन एवं समाधान होता है। विवेक की पराकाष्ठा ही वैराग्य है। संन्यासी व्यक्ति इस संसार में रहते हुए सभी कामनाओं से विरक्त होकर निर्लिप्त बने रहते हैं तथा ईश्वर भक्ति, गुरु भक्ति में लीन रहते हुए भौतिक सुख-सुविधाओं के प्रति उदासीन रहते हैं।
परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज ने योग, आयुर्वेद को प्रतिष्ठापित करने के साथ-साथ एक आदर्श संन्यासी के स्वरूप को जन-जन तक पहुँचाया है। इससे लोगों की आस्था सनातन व संन्यास धर्म के प्रति बढ़ी है। उनका मानस वैराग्य, त्याग, हमारी ऋषि परम्परा, प्राचीन भारतीय मूल्यों व आदर्शों से जुड़ा है। संन्यास धर्म में कुछ पाने की इच्छा नहीं होती, यहाँ तो सर्वस्व त्यागकर आत्म बलिदान से राष्ट्र आराधना की भावना है। यदि आज भारत का युवा संन्यास मार्ग पर चलने को तैयार है तो देश के भावी भविष्य के लिए इससे शुभ कुछ नहीं हो सकता।
पूज्य साहेब शांति दादा जी अनुपम मिशन, गुजरात
संन्यास परम्परा में गुणातीत संन्यासी शीर्ष संन्यासी माना जाता है। स्वामी जी गुणातीत संन्यासी के अनुरूप सांसारिकता व भौतिकता से परे हैं। उन्होंने भावी संन्यासियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आप ऐसे गुरु के सान्निध्य में दीक्षित हो रहे हैं जिनकी आज्ञा मात्र में रहने से ही हठ, ईष्या, अहंकार आदि दोष दूर हो जाते हैं और आप भीतर से संन्यासी हो जाते हैं।
परम पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज तथा परम पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी महाराज के कुशल नेतृत्व में पतंजलि के माध्यम से स्वास्थ्य व शिक्षा का बहुत बड़ा आंदोलन चलाया जा रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय शिक्षा बोर्ड, पतंजलि गुरुकुलम्, आचार्यकुलम्, पतंजलि विश्वविद्यालय तथा पतंजलि आयुर्वेद काॅलेज के माध्यम से शिक्षा के स्वदेशीकरण का बड़ा कार्य किया जा रहा है। जनमानस को आरोग्यता प्रदान करने का कार्य भी पतंजलि के द्वारा किया जा रहा है। इनके साथ ही जैविक कृषि, सूचना तकनीकी तथा उद्योग में भी बड़ा कार्य किया जा रहा है। आने वाले समय में पतंजलि के संन्यासियों की भूमिका अहम रहेगी।

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