आयुर्वेद में वर्णित अजीर्ण का स्वरूप, कारण व भेद

आयुर्वेद में वर्णित अजीर्ण का स्वरूप, कारण व भेद

अजीर्ण के भेद-                        अजीर्णप्रभवा रोगास्तदजीर्णं चतुर्विधम्।                        आमं विदग्धं विष्टब्धं चतुर्थकम्।           प्रायः सभी रोग अजीर्णप्रभव (अजीर्ण से उत्पन्न होने वाले) होते हैं। अजीर्ण चार प्रकार का माना जाता है- आमाजीर्ण, विदग्धाजीर्ण, विष्टब्धाजीर्ण व रसशेषाजीर्ण।           आमाजीर्ण में कफ की अधिकता से अग्निमान्द्य रहता है। इसमें खाया हुआ अन्न ‘आम’ (अपक्व) रहता है, अतः इसका नाम आमाजीर्ण है। विदग्धाजीर्ण में पित्ता…

अजीर्ण के भेद-
                       अजीर्णप्रभवा रोगास्तदजीर्णं चतुर्विधम्।
                       आमं विदग्धं विष्टब्धं चतुर्थकम्।
          प्रायः सभी रोग अजीर्णप्रभव (अजीर्ण से उत्पन्न होने वाले) होते हैं। अजीर्ण चार प्रकार का माना जाता है- आमाजीर्ण, विदग्धाजीर्ण, विष्टब्धाजीर्ण व रसशेषाजीर्ण।
          आमाजीर्ण में कफ की अधिकता से अग्निमान्द्य रहता है। इसमें खाया हुआ अन्न ‘आम’ (अपक्व) रहता है, अतः इसका नाम आमाजीर्ण है। विदग्धाजीर्ण में पित्ता की अधिकता से अग्निमान्द्य रहता है। इसमें खाया हुआ अन्न अम्ल (एसिड) रूप में परिणत हो जाता है, अतः इसे विदग्धाजीर्ण कहते हैं। विष्टब्धाजीर्ण में वात की अधिकता से अग्निमान्द्य रहता है। इसमें खाया हुआ अन्न विष्टब्ध अर्थात् उदर में स्तम्भित होकर पड़ा रहता है तथा अपच बनी रहती है, अतः इसे विष्टब्धाजीर्ण कहते हैं। रसशेषाजीर्ण में दूसरे आहार-काल तक पूर्वभोजन का बिना पचा रस शेष रहता है तथा भोजन की इच्छा नहीं होती है।
आमाजीर्ण के लक्षण-
                         तत्रामे गुरुतोत्क्लेदः शोफो गण्डाक्षिकूटजः।
                         उद्गरश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्तते।। -(माधव., अजीर्ण.-9)
            आमाजीर्ण में शरीर में भारीपन, उत्क्लेद (वमन की इच्छा), कपोल (गाल) तथा अक्षिकूट (आँखों के किनारों पर) सूजन होती है तथा खट्टोपन से रहित डकारें आती हैं। भाव यह है कि आमाशय मंे क्लेदक कफ की अधिकता होने से प्रारम्भ में खाए अन्न पर अम्लरस का प्रभाव नहीं पड़ता, अन्न में माधुर्य होने से डकारें खट्टी नहीं होतीं।
विदग्धाजीर्ण का लक्षण-
                          विदग्धे भ्रमतृण्मूर्छाः पित्ताच्च विविधाः रुजः।
                          उद्गरश्च सधूमाम्लः स्वेदो दाहश्च जायते।। -(माधव., अजीर्ण.-10)
विदग्धाजीर्ण पित्तजन्य होता है। इसमें भ्रम, प्यास, मूर्छा तथा अनेक प्रकार के पित्तज विकार होते हैं। खट्टी डकारों के साथ मुँह से धंुआ-सा निकलता है। स्वेद और दाह विशेष रूप से होते हैं।

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